हरिहर की धरती हरियाणा

सबका प्यारा, सब तैं न्यारा, ‘हरिहर ‘ की धरती हरियाणा । तीरथ-मेले-धरोवरों का, धरम-धाम यो हरियाणा ।। टेक ।।

‘हरिहर’ की धरती की महमा, वेद -पुराणों मैं गाई ।
गौरव-गाथा हतिहासों कैं, स्वर्ण – अक्षरों मैं छाई ।।
आर्यवर्त, ब्रह्मवर्त, सारस्वत, नामा तैं सब नैं भाया ।
‘हरि’ का ‘यान’ उरै आणै तैं, ‘हरियाणा’ यो कहलाया ।।
‘सप्तसिंधु ‘ का देस कदीमा, ब्होत पुराणा हरियाणा ।
सब का प्यारा, सब तैं न्यारा, ‘ हरिहर’-धरती हरियाणा ।। 1 ।।

घाग्गर, जमना, सरस्वती की, बहवैं पावन जलधारा । ऋषि-मुनियों की तपोभूमि सब, देव-देवियों का प्यारा ।।
सरिस्टी रचना खातर आड़ै, ‘ब्रह्मा’ नै था यज्ञ किया ।
श्रीकृष्ण नै कुरुक्षेत्र मैं, गीता का उपदेस दिया ।।
‘महाभारत’ का धर्म युद्ध यो, जीत्तण वाला हरियाणा ।
सब का प्यारा, सब तै न्यारा, ‘हरिहर’-धरती हरियाणा ।। 2 ।।

कदम-कदम पै धरम-थलों मैं, सद्भावों की ज्योत जली । संत-फकीरों, सतगुरुओं कै परमारथ की खिली कली ।।
कुरुक्षेत्र, थानेसर, पेहवा, संकटमोचन धाम बणे ।
हिसार, भिवानी, हांसी बरगे, धरोहरों के नाम घणे ।। पुण्य-तीर्थो, मेलों कारण, रोशन जग मैं हरियाणा ।
तीरथ-मेले-धरोहरों का, धरम-धाम यो हरियाणा ।। 3 ।।

ज्यब-ज्यब इसपै आफत आयी, जंग लड़े रणधीरों नै ।
धूल चटा जीते दुश्मन तैं, योधेय, भरत से वीरों नैं ।।
स्वतंत्रता-संग्राम लड्या था, जनता, वीर जवानों नै।
कुर्बानी दे-दे चमकाया, देस सदा दीवानों नै ।।
देस प्रेम मैं सब तैं आग्गै, सदा रह्या यो हरियाणा ।
सब का प्यारा सब तैं न्यारा, ‘हरिहर की धरती हरियाणा ।। 4 ।।

आओ! मिलजुल सारे इसनै, ऊंचा देस बणा देवां ।
ऊंच-नीच के, जात-पात के, चुकती भेद भुला देवां ।।
हरे-भरे बन-खेता तैं यो, ‘बहु धान्यक’ फिर कहलावै ।
च्यारूं तरफ विकास तैं इसकी, ख्याती-गिणती हो ज्यावै ।।
देसा मैं यो देस निराला, बणज्या म्हारा हरियाणा ।
सब का प्यारा, सब तैं न्यास ‘हरिहर की धरती हरियाणा ।। 5 ।।

बचपन का टेम

बचपन का टेम याद आ गया कितने काच्चे काटया करते,
आलस का कोए काम ना था भाजे भाजे हांड्या करते ।

माचिस के ताश बनाया करते कित कित त ठा के ल्याया करते
मोर के चंदे ठान ताई 4 बजे उठ के भाज जाया करते ।

ठा के तख्ती टांग के बस्ता स्कूल मे हम जाया करते,
स्कूल के टेम पे मीह बरस ज्या सारी हाना चाहया करते ।

गा के कविता सुनाके पहड़े पिटन त बच जाया करते,
राह म एक जोहड़ पड़े था उड़े तख्ती पोत ल्याया करते ।

“राजा की रानी रुससे जा माहरी तख्ती सूखे जा” कहके फेर सुखाया करते ,
नयी किताब आते ए हम असपे जिलत चड़ाया करते ।

सारे साल उस कहण्या फेर ना कदे खोल लखाया करते ,
बोतल की खाते आइसक्रीम हम बालां के मुरमुरे खाया करते ।

घरा म सबके टीवी ना था पड़ोसिया के देखन जाया करते
ज कोए हमने ना देखन दे फेर हेंडल गेर के आया करते ।

भरी दोफारी महस खोलके जोहड़ पे ले के जाया करते ,
बैठ के ऊपर या पकड़ पूछ ने हम भी बित्तर बड़ जाया करते ।

साँझ ने खेलते लुहकम लुहका कदे आती पाती खेलया करते,
कदे चंदगी की कदे चंदरभान की डांटा न हम झेलया करते ।

बुआ आर काका भी माहरे खूब ए लाड़ लड़ाया करते,
जब होती कदे पिटाई त बाबू ध्होरे छुड़वाया करते ।

खेता कहण्या जा के फेर नलके टूबेल पे नहाया करते,
चूल्हे ध्होरे बैठ के रोटी घी धर धर के खाया करते ।

होती फेर सोवन की तयारी दादा दादी कहानी सुनाया करते,
बिजली त कदे आवे ना थी बस बिजना हलाया करते ।

हल्की हल्की सी हवा लागती हमते फेर सो जाया करते,
तड़के न जब आँख खुलती सारे ऊट्ठे पाया करते ।

दूसरी खाटा के गुददड़े बत्ती सीले से पाया करते,
छोड़के अपनी खाट न दूसरी पे हटके सो जाया करते ।

जांगड़ा तू क्यां मै बड ग्या जा के कोए ईंट लगा ले न,
ज ईंट लगानी बसकी कोनया आरी राँड़ा ठाले न ।

यो शायरी का काम छोड़ दे इसने मै संभालूँगा,
औरा की त बात छोड़ तेरे पे भी वाह वाह कहवा ल्यूङ्गा ।

लिखण की कोए इच्छा ना थी उकसाया जांगड़ा भैया न।
जिद्दा म ये लाइन बना दी जितेंद्र नाम के दहिया न ॥

मन्नै छोड कै ना जाइए

मन्नै छोड कै ना जाइए,
मेरे रजकै लाड़ लड़ाइए,
अर मन्नै इसी जगां ब्याइए,
जड़ै क्याकैं का दुख ना हो।

छिक के रोटी खाइए,
अर मन्नै भी खुवाइए,,
जो चाहवै वो ए पाइए,
पर मन्नै इसी जगां ना ब्याइए,
जड़ै क्याकैं का सुख ना हो।

माँ तेरे पै ए आस सै,
पक्का ए विश्वास सै,
तू ए तो मेरी खास सै,
यो खास काम करके दिखाइए।

माँ की मैं दुलारी सुं,
ब्होत ए घणी प्यारी सुं,
दिल तैं भी सारी सुं,
पर कदे दिल ना दुखाइए।

बाबु का काम करणा,
रूपए जमा करके धरणा,
इन बिना कती ना सरणा,
काम चला कै दिखाइए।

गरीबी तै तनै लड़-लड़कै,
रातां नै खेतां म्हं पड़-पड़कै,
अपणे हक खातर अड़-अड़कै,
बाबु ब्होत ए धन कमाइए,
पर मन्नै इसी जगां ना ब्याइए
जडै क्याएं का सुख ना हो।

माँ-बाबु तामै मन्नै पालण आले,
मेरे तो ताम आखर तक रूखाले,
वे इबे मन्नै ना सै देखे भाले,
कदे होज्या काच्ची उम्र म्हं चालै,
‘संदीप भुरटाणे’ आले मन नै समझाइए,
पर मन्नै इसी जगां ना ब्याइए,
जडै क्याएं का सुख ना हो।